- इश्क़ ने गुथे थे जो गजरे नुकीले है तेरे हाथो में कंगन भी ढीले हो गए है फूल बेचारे अकेले रह गए है साख पर गावो की सब तितलियों के हाथ पिले हो गए
- रोज तारो को नुमाइस में खलल पड़ता है चाँद पागल है अंधरे में निकल पड़ता है उसकी याद आयी है सासो जरा धीरे चलो धड़कनो से भी इबाबत में खलल पड़ता है
Sunday, December 2, 2018
पेश है राहत इंदौरी साहब की रोमांटिक शायरी
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इश्क के गम
अपना गम किस किस से बोला जाए हैं कितनी परेशानियां इश्क़ में इसे कैसे तौला जाए
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नम आँखे कहती है मुझे तुम याद आते हो टूटती सांसे कहती है मुझे तुम याद आते हो कभी जो तन्हा बैठू दो घड़ी दुनिया से छुप के मै तो फिसलती ज...
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